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पूर्व में भारतीय आयुर्विज्ञान इतिहास संस्थान (भा.आ.इ.सं.) के नाम से विख्यात राष्ट्रीय भारतीय आयुर्विज्ञान संपदा संस्थान (रा.भा.आ.सं.सं.) आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होमियोपैथी, सोवा रिग्पा (आयुष) एवं आधुनिक चिकित्सा के ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन एवं प्रलेखन में रुचि रखने वाले इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं अन्य लोगों के लिए सामग्री उपलब्ध कराता है।

दक्षिण-पूर्वी एशिया का अपनी तरह का एक मात्र यह संस्थान गड्डिअन्नारम्, दिलसुखनगर, हैदराबाद में नवीन भवन में स्थित है। (पहले यह उस्मानिया मैडिकल कॉलेज, हैदराबाद के तृतीय तल पर स्थित था।)

यह दिनांक 26-09-1956 से आन्ध्रप्रदेश सरकार के अधीन उन्नत आयुर्विज्ञान इतिहास विभाग के रूप में अस्तित्त्व में आया एवं इसके राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के कारण भारत सरकार को 14-02-1969 को हस्तान्तरित किया गया। यह संस्थान केन्द्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसन्धान परिषद् (के.आ.वि.अनु.प.), आयुष विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय, भारत सरकार के प्रशासकीय नियन्त्रण के अधीन कार्य कर रहा है।

आयुर्विज्ञान इतिहास पर अनुसन्धान सामग्री के अपने विशाल संकलन के कारण यह वैश्विक पहुँच में है। संस्थान के पास एक चिकित्सीय-ऐतिहासिक पुस्तकालय, संग्रहालय और प्रलेखन विभाग है। संस्था का पुस्तकालय 10,000 से अधिक पुस्तकों के संकलन से विलक्षण है, जिसमें विभिन्न भाषाओं में वैद्यक इतिहास और सम्बद्ध विषयों पर 15वीं सदी से पूर्व के अतिदुर्लभ प्रकाशन सम्मिलित है एवं वैद्यक सहयोग के कार्य लिए यह अनुसन्धान सम्बन्धित केन्द्र है। इसमें आयुर्विज्ञान इतिहास पर उच्चस्तर की राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं का इसके आरम्भ से पूर्ण संकलन है। यह संस्थान एन.टी.आर. युनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साईंसेस, आन्ध्रप्रदेश द्वारा मान्यता प्राप्त पीएच.डी. प्रदान कर रहा है।

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